2016/11/06

जम्मू-कश्मीर यात्रा:- छतरगला से बनी (खूबसूरत सरथल घाटी)

जम्मू-कश्मीर यात्रा:- छतरगला से बनी (खूबसूरत सरथल घाटी)

छतरगला से बनी (खूबसूरत सरथल घाटी)

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तीन बजे के लगभग कोठारी जी के पहुँचते ही हम सरथल घाटी की ओर निकल पड़े। कल से अभी तक इक्का-दुक्का ही स्थानीय लोग मिले थे, उनसे आगे इस सड़क के बारे में जानकारी ली थी तो मालूम पड़ा कि छतरगला से बनी तक रास्ता ठीक ही है। सभी ने बताया कि कुछ किलोमीटर आगे तक कच्ची सड़क है, फिर आगे पक्की बनी हुई सड़क मिलेगी। मैं जब भी अपने वाहन से घूमने निकालता हूँ तो प्राथमिकता होती है कि ज्यादा से ज्यादा नए रास्तों को देख लिया जाए। इसी वजह से कोशिश यही रहती है कि एक ओर से जाकर दूसरी ओर से वापसी की जाए। हालाँकि इस बार कैलाश कुण्ड यात्रा का कार्यक्रम आनन-फानन में ही बना था, एक सप्ताह पहले तक इस प्रकार से सीधे जम्मू-कश्मीर राज्य में घूमने का कोई भी इरादा नहीं था, इसलिए ये भी पहले से तय नहीं था कि हमारी वापसी किधर से होगी।भदरवाह पहुँचने के बाद रमेश भाई जी को मना लिया कि वापसी सरथल घाटी देखते हुए बनी होकर करेंगे। बस इससे फर्क इतना पड़ता कि रमेश जी को हम सभी से बशोली से उधमपुर तक करीब १२० किलोमीटर की दूरी अकेले तय करनी पड़ती। जबकि हम वशोली से दुनेरा होते हुए पठानकोट की बस लेकर दिल्ली के लिए निकल जाते। रमेश जी ने हम सभी की इच्छा का सम्मान करते हुए भी हामी भर दी थी।

छतरगला से कच्चे और सुनसान रास्ते से ही शुरुआत होती है। आस-पास ना तो कोई गाँव दिखाई पड़ता है ना ही सड़क किनारे किसी बसावट के निशान। असल में ये पूरी घाटी चरवाहों के लिए स्वर्ग है। बर्फ के पिघलते ही चरवाहे यहाँ अपने जानवरों के साथ आ पहुँचते हैं, और सर्दियों की आहट मिलते ही निचली जगहों के लिए चले जाते हैं। साल के छह महीने जानवरों की यहाँ उपस्थिति के कारण पूरी घाटी में हरियाली की भरमार रहती है। घाटी की खूबसूरती का अंदाजा तो छतरगला से ही एक झलक देखकर लगाया जा सकता है। एक समय आतंकवाद इस क्षेत्र में अपने चरम पर था। डोडा के जंगलो से कश्मीर घाटी तक लगातार जंगल और पहाड़ियां हैं। भौगोलिक परिस्थतियों का लाभ लेकर यहाँ खूब आतंक फैलाया गया। जम्मू के सीमावर्ती जंगलों से आतंकी इन पहाड़ियों से होते हुए आसानी से कश्मीर घाटी में प्रवेश कर जाते थे। दूसरी ओर पदरी की पहाड़ियों के पार हिमाचल की सीमा प्रारम्भ हो जाती है। इसलिए हिमाचल सरकार ने उस समय इस सड़क मार्ग को बंद कर कड़ी सुरक्षा अपने क्षेत्र में लगा दी थी।

घुमावदार कच्ची सड़क और बेपनाह खूबसूरती से कुदरत ने इस घाटी को नवाजा है। मैं कार की खिड़की वाली सीट पर बैठकर कैमरे से लगातार फ़ोटो खींचता रहा। हमारी टीम में अकेला मैं ही था जो अपने यात्रा वृतान्त प्रकाशित करता है। बाकी ठहरे ठेठ घुमक्कड। ब्लोगरों के बारे में जो भी टाँग खिंचाई की जानी थी वो सबके बदले की अकेले मेरी हो ही रही थी। हालांकि चलती गाडी से खींचे गए फ़ोटो इतने खूबसूरत नहीं आते जितने कि आराम से खड़े होकर खींचे गए फ़ोटो। लेकिन समय की कमी थी और आज ही हमको बनी तक पहुँचना था। फिर भी जहाँ कहता रमेश जी फ़ौरन गाडी में ब्रेक लगा ही लेते थे। पूरे रास्ते भर कोई ट्रैफिक नहीं मिलता। असल में छतरगला के बाद जो भी इस ओर सरथल घाटी में जो भी स्थानीय लोग रहते हैं उनके लिए बनी की ओर जाना ज्यादा सुविधाजनक रहता है। और छतरगला तक वालों के लिए भदरवाह जाना ज्यादा सुविधाजनक है। भदरवाह से बनी के लिए कोई सीधी बस भी नहीं है और शायद पूरे दिन में एक-आध जीप के सिवा कुछ होगा भी नहीं। 

सरथल घाटी में सड़क ठीक-ठाक ही बनी है लेकिन छोठी कार के लिए ख़ास उपयुक्त नहीं है। हमारी लाल परी मारुती की वेगन आर है, ये भी छोठी ही गाडी है। पहाड़ों में अक्सर छोठे-छोठे पहाड़ी नाले बहकर आते मिलते रहते हैं। पानी की गहराई का अंदाजा तो मालूम पड़ ही जाता है, लेकिन इनके अन्दर पड़े पत्थरों का कई बार अंदाजा नहीं लग पाता। डर लगा रहता है कि इन नालों को पार करते हुए नीचे से ये गाडी से टकरा ना जाए। इस क्षेत्र में अगर गाडी में किसी वजह से कुछ खराबी आ जाए तो मदद की कोई गुंजाइश नहीं है। इसलिए जगह-जगह पर जैसे ही इन नालों से भेंट होती तो हम सभी नीचे उतर जाते। बाइक से यात्रा करने के लिए सरथल घाटी अपने आप में परिपूर्ण है। जो भी मित्र अक्सर ऐसे रास्तों की तलाश में रहते हैं कि कुछ नया देखने को मिले, बेपनाह खूबसूरती हो, ट्रैफिक बिल्कुल ना के बराबर मिले या मिले ही नहीं, और रोमांच साथ में जरूर जुड़ा हो, तो उनको अवश्य ही इस सड़क पर बाइक लेकर आना चाहिए।  

सुबह से चाय तक नसीब नहीं हुई थी। एक अदद स्टील के गिलास से भरी हुई चाय का सबको इंतज़ार था। पिछले दो घण्टे से अब कोई दुकान मिलेगी तब कोई दुकान मिलेगी यही इन्तज़ार किए जा रहे थे, लेकिन कुछ नहीं मिला। लुवांग बाजार काफी दूर से दिखाई देना शुरू हुआ तो अब तो पूरी आस जग गई कि यहाँ पर चाय तो मिल ही जायेगी। साथ में मन में लड्डू भी फूटने लगे कि चाय में भिगो-भिगो के बिस्कुट भी खाऊंगा। लुवांग में प्रवेश करते ही एक चाय की दुकान दिखी, लेकिन उसमे कच्चे अण्डों की ट्रे रखी देझकर रमेश जी ने गाडी नहीं रोकी। जबकि मैं चिल्लाता रहा कि ये रही दुकान यहाँ रोक दो। उन्होंने कहा कि आगे देखते हैं, वहां रोकूँगा।

कोई पचास मीटर आगे जाकर गाडी रोकी तो एक सज्जन जो सड़क किनारे बैठे थे उनको पास बुलाकर पूछा कि यहाँ पर चाय की दुकान कहाँ पर मिलेगी। साथ में ही एक और चाय की दुकान थी, उन सज्जन ने उसकी ओर इशारा कर दिया। रमेश जी ने उस दुकान की ओर देखा और फिर कहा कि ये तो मुस्लिम दुकान है, कोई हिन्दू की दुकान बताओ। उन सज्जन ने हंसकर जबाब दिया कि हिन्दू लोग यहाँ चाय नहीं पीते। असल में लुवांग पूरा ही मुस्लिम आबादी वाला क्षेत्र है। पूरे बाजार में भी मुस्लिम लोगों की दुकाने ही मिलेंगी। रमेश जी शुद्ध शाकाहारी हैं, वो अंडा तक नहीं खाते लेकिन ग्रामीण क्षेत्र की चाय की दूकानों में चाय, अंडा सभी कुछ मिलता है।

एक बार मुझे रमेश भाई जी के इस प्रकार से प्रश्न पूछने पर अटपटा भी लगा। मैंने उनसे सीधे कहा भी कि आपको इस तरह से नहीं पूछना चाहिए था। लेकिन वो इस क्षेत्र में ही रहते हैं, डोगरी में सभी स्थानीय लोगों से बातचीत कर रहे थे, तो हो सकता है यहाँ ऐसे ही चलता हो। बहरहाल चाय यहाँ भी नहीं मिली, कोठरी जी के मन की इस वक्त क्या हालत हुई होगी कहना भी मुश्किल है। सबसे बड़े चाय प्रेमी इस पूरी टीम में वही थे।

लुवांग से आगे सड़क चैड़ीकरण निर्माण कार्य बड़ी ही तेजी से होता हुआ दिखाई दिया। पूरे रास्ते को चार लेन का बनाया जा रहा है। इस सड़क निर्माण के बाद यहाँ अमूल चूल परिवतर्न आएगा ये निश्चित है। पूरी घाटी में प्राकृतिक सुन्दरता की भरमार है। मुझे तो याद नहीं आ रहा कि पिछली बार एक ही घाटी में इतनी सुन्दरता एक साथ कब देखी थी। जम्मू-कश्मीर पर्यटन विभाग भी इस क्षेत्र की ओर अब ध्यान देता प्रतीत हो रहा है। जगह-जगह पर्यटन विभाग के होर्डिंग लगे दिखाई देते हैं। कुछ निर्माण कार्य भी कहीं-कहीं दिखाई देने लगे हैं।
छतरगला से लगातार उतराई के साथ सड़क नीचे घाटी की ओर आती है, वहीँ लुवांग से घाटी के तल के साथ-साथ आगे बढ़ती है। कहीं-कहीं पर पक्की सड़क भी मिल जाती है, लेकिन अधिकतर अभी कच्ची ही बनी है। बीच में कोई भी बड़ा बाजार पूरे रास्ते भर कहीं नहीं मिला, लुवांग से आगे अब सीधे बनी में ही कुछ खाने को मिलेगा। दूरी लगभग सत्तर किलोमीटर है। आराम से घाटी के शानदार नजारों का आनंद लेते हुए शाम के छह बजे के लगभग बनी पहुँच गए।

आज रात्रि का विश्राम बनी में ही करना तय किया। जब यहाँ पर रात रुकने की बाबत जानकारी ली तो सरकारी गेस्ट हॉउस आसानी से मिल गया। बनी भी जम्मू-कश्मीर राज्य का शानदार शहर है। घाटी में नदी के साथ इसकी बसावट इसको और भी शानदार बना देती है।
गेस्ट हाउस से कुछ ही ऊपर मुख्य सड़क पर एक ढाबे में खाने के लिए कहकर कमरे में आराम करने आ गए।













































  1. भाई फोटो बहुत सुंदर आये है। चाय नहीं मिली यह जानकर दुःख हुआ और जब मिली तब चाय का भी धर्म हो गया ये जानकर कुछ अटपटा सा लगा।
    सुन्दर पोस्ट अगले पोस्ट का इंतजार रहेगा।

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  2. मनमोहक चित्र एवम वर्णन

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  3. बेहद खूबसूरत सरथल घाटी के सुन्दर नजारों ने याद ताज़ा कर दी। जगह-जगह रुक कर नजारों को देख कर भी मन नहीं भरा था। घाटी की खूबसूरती ने चाय की तलब को हावी नहीं होने दिया। :)

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  4. एक बार मुझे रमेश भाई जी के इस प्रकार से प्रश्न पूछने पर अटपटा भी लगा। मैंने उनसे सीधे कहा भी कि आपको इस तरह से नहीं पूछना चाहिए था। लेकिन वो इस क्षेत्र में ही रहते हैं, डोगरी में सभी स्थानीय लोगों से बातचीत कर रहे थे, तो हो सकता है यहाँ ऐसे ही चलता हो। बहरहाल चाय यहाँ भी नहीं मिली, कोठरी जी के मन की इस वक्त क्या हालत हुई होगी कहना भी मुश्किल है। सबसे बड़े चाय प्रेमी इस पूरी टीम में वही थे। तो चाय आखिर मिली कहाँ ? या जैसे कोठारी जी ने कहा कि सुरताल घाटी की खूबसूरती ने चाय भुलवा दी , सही है क्या ? खैर जो भी हो , घाटी सच में बहुत खूबसूरत है और उसका वृतांत भी बढ़िया लिखा है आपने ! आज फिर शुरू से इस पूरे यात्रा वृतांत को

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    1. सायं के 7 बजे, जब बनी पहुंचे। तब मुझे व अमित को एक ढाब्बे पर प्रातः कालीन पेय के लिये छोड़ कर रोमेशजी अन्य साथियों के साथ रात्रिकालीन पेय व आवास व्यवस्था के लिए आगे बढ़ लिये ;-)

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  5. धन्यवाद योगी भाई। आपके प्रश्न का जबाब तो कोठारी जी ने दे ही दिया।

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  6. पल-पल पग-पग की कथा कहे है आपने । बहुत सुन्दर लग रहे है यह श्रृखंला ।

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  7. पोस्ट के अन्त मे दिये गये लिंक पर क्लिई करने पर आपका पुराना ब्लाॅग का पता दिखाता है जो हटाया हुआ बताता है । इस श्रृंखला के अगले अथवा पिछले भाग को कैसे पढे ।

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    1. ठीक कर दिए लिंक, अब आसानी से किसी भी भाग पर जा सकते हैं.

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